LIK (Love Insurance company)

 
Movie Review: क्या Social Media का “Brainrot” Culture सिनेमा में हिट हो पाया?
 Introduction (प्रस्तावना: Social Media की चकाचौंध और सच्चाई)

 

आज के दौर में, क्या हमारा social media अपने आप में एक बहुत बड़ा, कन्फ्यूजिंग और jagged (उलझा हुआ) mess नहीं बन चुका है? हम सभी बिना सोचे-समझे लगातार reels, shorts, stories, posts, carousels और न जाने कितने updates को doomscroll करते रहते हैं। लेकिन ज़रा सोचिये, क्या हो अगर इस पूरे digital chaos और फ्रस्ट्रेशन को frame by frame बहुत ही खूबसूरती से शूट किया जाए?

मान लीजिए कि इसे किसी painting की तरह पर्दे पर उतारा जाए, जिसमें एक vivid colour palette हो, जो VFX से भरपूर हो, जिसकी DI (Digital Intermediate) बहुत ही आकर्षक हो, और जिसे उसी meme-driven background score के साथ पेश किया जाए। Director Vignesh Shivan की नई फिल्म “LIK” (Love Insurance Kompany) असल में बिलकुल यही experience देती है।

फिल्म के साथ असल issue यह नहीं है कि यह देखने में किसी “eye candy” की तरह बहुत ही resplendent (चमकदार) और खूबसूरत लगती है। बल्कि असली समस्या यह है कि डायरेक्टर ने इस खूबसूरती के चक्कर में social media के असली chaos और पागलपन को फ्रेम में आने ही नहीं दिया है।

The Plot & Setting (कहानी और 2040 का चेन्नई)

2040 का Futuristic World फिल्म हमें 2040 के Chennai के एक बेहद दिलचस्प, हालांकि uneven (असंतुलित) तरीके से execute किये गए, makeover में ले जाती है। फिल्म का यह detailed futuristic setting शुरुआत में अच्छा लगता है, लेकिन इसमें कुछ mistakes भी हैं (जो देखने में adorable लगती हैं)।

Characters की दुनिया

  • इस फिल्म में Pradeep Ranganathan ने ‘Vibes Vassey’ का किरदार निभाया है।
  • Vibes Vassey का Dheema (Krithi Shetty) से बारिश में होने वाला encounter कोई deliberate (जानबूझकर किया गया) काम नहीं लगता, बल्कि fortuitous (संयोगवश) लगता है, जो शुरुआत में ही छाते (umbrella) की specificity को establish कर देता है।
  • SJ Suryah इस फिल्म में ‘Suriyan’ नाम के एक multi-billionaire tech guru के रूप में नज़र आते हैं। वो एक AI-driven app के ज़रिये intimacy के पूरे कांसेप्ट को reshape कर रहे हैं। Suriyan अपने trademark फॉर्म में हैं; वो काफी jocular (मज़ाकिया), natty (स्टाइलिश) हैं और चीज़ों को बहुत ही giddily (चंचलता से) करते हैं।
  • डायरेक्टर ने Seeman (जो असल ज़िंदगी में एक filmmaker से राजनेता बने हैं और agrarian society के समर्थक हैं) को एक stunt-casting के तौर पर एक ashram guru का रोल दिया है। यह गुरु एक tech-free world बनाने की कोशिश कर रहा है और उसे so-called elite लोगों की English के खिलाफ preach करने (उपदेश देने) का एक सीन भी दिया गया है।

The Misses: What Doesn’t Work (फिल्म कहाँ कमज़ोर पड़ जाती है?)

  1. Aesthetics vs. Reality (चकाचौंध ने मार दी असलियत) Vignesh Shivan का brainrot culture को कैप्चर करने का attempt plausible (तर्कसंगत) तो है, क्योंकि वो जानते हैं कि कहाँ self-censor करना है और कहाँ नहीं। लेकिन उन्होंने internet के addiction की grimness (भयानकता) को aesthetics से पूरी तरह sanitize कर दिया है। उदाहरण के लिए, जब फ़ोन के addicts अपने फ़ोन्स को चकनाचूर करते हैं, तो यह सीन severed (गंभीर) फील होना चाहिए था। लेकिन यह महज़ एक कांच टूटने जैसा लगता है, जहाँ उनके फ़ोन फेंकने पर एक sound effect आता है और सीन तुरंत कट हो जाता है।

यह फिल्म “Black Mirror” के Bryce Dallas Howard वाले एपिसोड “Nosedive” से compare की जाती है, लेकिन यह comparison पूरी तरह misplaced (गलत) है। “Nosedive” में pastel aesthetic धीरे-धीरे टूट जाता है और दिखाता है कि कैसे ratings किसी का social status तय करती हैं, जिससे कहानी बहुत bleak (निराशाजनक) हो जाती है। वहीं “LIK” एक luxurious commodity की तरह फील होती है, जिससे love की commodification (प्यार का बाज़ारीकरण) के मुद्दे पर ध्यान देना मुश्किल हो जाता है।

  1. The Male Gaze and Problematic Framing (पुरुषवादी दृष्टिकोण) फिल्म का सबसे बड़ा problematic हिस्सा इसका ‘male gaze’ (पुरुषवादी नज़रिया) है।
  • फिल्म में पुरुषों को फीमेल लीड को prolongedly ogle करते (देर तक घूरते) हुए दिखाया गया है।
  • फीमेल लीड को बहुत detail में describe किया जाता है और “b*tch” जैसे casual शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।
  • यही नहीं, पुरुषों को titillate (उत्तेजित) करने के लिए एक model को objectify भी किया गया है।

यह framing इसलिए भी बहुत disturbing है क्योंकि LIK ऐप का algorithm पुरुषों द्वारा डिज़ाइन किया गया है, इसे पुरुष ही चलाते हैं, और इसमें आवाज़ भी पुरुषों की है। फिर भी, फिल्म influencer culture और social media validation के पीछे भागने का पूरा blame सिर्फ औरतों पर डाल देती है। किसी पुरुष द्वारा औरतों की insecurities से profit कमाने का यह आईडिया फिल्म को काफी troubling बना देता है, और यह महिलाओं को महज़ metrics में reduce करने वाले Suriyan को criticism से बचाने की एक flawed (दोषपूर्ण) कोशिश लगती है।

  1. Missing the Real Internet (असली इंटरनेट की कमी) फिल्म खुद को उस ambivalent internet से काफी distance कर लेती है (जिसके बारे में Whitney Phillips और Ryan M Milner जैसे डिजिटल मीडिया स्कॉलर्स बात करते हैं)। बहुत से scholars (जैसे Jessica Vitak, Alice Marwick, Gabriella Coleman, Limor Shifman और Kyle Chayka) सोशल मीडिया को memetic play का एक swirling, shape-shifting mess मानते हैं। लेकिन यह फिल्म writer Charlie Squire के शब्दों में “marketable representation” का एक pithy liberal presentation बनकर रह जाती है। डायरेक्टर सिर्फ wealthy influencers को represent करते हैं और वैसा ही काम कर रहे छोटे rural लोगों को पूरी तरह ignore कर देते हैं।

Vignesh “Internet’s Ugly” (जैसा कि writer Nick Douglas ने describe किया है) को भूल जाते हैं और digital excess को महज़ सुंदरता (pulchritude) का टैग दे देते हैं।

  1. Forced Brand Promotions (ब्रांड्स का अनावश्यक दिखावा) फिल्म में brands को ऐसे उछाला गया है जैसे कोई confetti (कागज़ के टुकड़े) हो। लेकिन उनकी relevance या purpose क्या है, यह समझ नहीं आता।

The Hits: What Actually Works (फिल्म की अच्छी बातें)

  1. The Rant on Real-World Issues (जॉब मार्केट पर शानदार सीन) हालाँकि फिल्म काफी हद तक magic realism और fantasy में रहती है, लेकिन जब यह reality से टकराती है, तो यह बुलबुले की तरह फूटती है।
  • इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण Pradeep का एक well-staged सीन है, जहाँ वो current job search की हालत पर rant करता है।
  • इस सीन में वो job cuts, loss, firing, hiring, ghosting और ‘AI slopocalypse’ के बारे में बात करता है।
  • वो उन apps के बारे में भी बोलता है जो आपके लिए job ढूँढने का दावा करते हैं लेकिन असल में spams, scams और fakery से भरे होते हैं।

एक तमिल हीरो के महज़ एक monologue के रूप में ख़ारिज किए जा सकने वाले इस सीन की फिल्म में सख्त ज़रूरत थी। यह डायलॉग डिलीवरी बहुत frantic (पागलपन से भरी) है और यह imaginative दुनिया में real-world issues को जोड़ने का इकलौता बेहतरीन सीन है।

  1. Casual Normalcy for LGBTQIA+ (क्वीर कम्युनिटी का सम्मानजनक चित्रण) फिल्म में gender lens का एक बेहतरीन shift तब दिखता है जब Vignesh बहुत ही delicately (नज़ाकत से) queer people को फिल्म की दुनिया में integrate करते हैं।
  • वो उन्हें judge नहीं करते, उनके किरदारों को बेवजह dramatise नहीं करते, और किसी भी tired stereotypes (पुरानी घिसी-पिटी सोच) का सहारा नहीं लेते।
  • इसके बजाय, वो queerness को उसी casual normalcy (सामान्य तरीके) के साथ दिखाते हैं जो cis-het (सीधे) प्रेमियों को दी जाती है।
  • mainstream सिनेमा में LGBTQIA+ identities को normalise करने के लिए इस तरह के quiet subversion (शांत बदलाव) की बहुत ज़रूरत है।
  1. Elaborate Songs and The Anirudh Magic (गानों का शानदार इस्तेमाल) फिल्म का एक और पुराना लेकिन बेहतरीन ‘Kollywood’ अंदाज़ इसके गाने हैं। Vignesh गानों को महज़ montages में समेटने के बजाय उन्हें massive sets और artwork के साथ elaborately शूट करते हैं, जो बहुत refreshing लगता है।

Anirudh का viral indie गाना “Enakenna Yaarum Illaye” अब फाइनली एक फिल्म के एल्बम का हिस्सा बन गया है।

  • यह गाना sad, self-pitying और male-centric है।
  • online forums में इसे दिल टूटे हुए आदमियों के लिए एक peppy soup song माना जाता है।
  • Vibe फिल्म में चौथी दीवार (fourth wall) तोड़कर audience को अपने साथ गाने के लिए कहता है।

लेकिन डायरेक्टर यहाँ एक शानदार twist लाते हैं। Vibe की close friend Kalki (जिसका रोल Gowri Kishan ने निभाया है), इस गाने को कुछ देर के लिए hijack कर लेती है।

  • वो बार में औरतों के साथ डांस करती है, पीती है, और उसी heartbreak को महसूस करती है, जिससे यह ट्रैक कुछ देर के लिए female-centric बन जाता है।
  • Soup song ecosystem में इस तरह का disruption बहुत rare (दुर्लभ) है।
  • हालाँकि Tamil Padam 2 के ‘Evanda Unna Petha’ जितने full subversion के लेवल तक यह नहीं पहुँच पाता, लेकिन फिर भी यह gaze (नज़रिये) को balance करने की एक अच्छी कोशिश है।

The AI Chatbot Metaphor (एक AI जैसा बर्ताव)

एक बहुत ही गहरी बात जो इस रिव्यु से निकल कर आती है, वो यह है कि डायरेक्टर Vignesh असल में वही काम कर रहे हैं जो एक AI chatbot करता है।

  • वो आपको सिर्फ pleasing responses (सुंदर फ्रेम्स) देते हैं ताकि आप वापस आते रहें, बजाय इसके कि वो आपके विचारों को challenge करें।
  • Writer Anna Wiener अपने essay “Love in the Time of AI Companies” में vulnerable लोगों की एक ‘listener’ के लिए desperate need को समझती हैं, लेकिन Vignesh उस गहराई तक पहुँचने में fail हो जाते हैं।
  • समाजशास्त्री James Muldoon भी अपनी ‘Love Machines’ में इन्ही concepts को explore करते हैं।

डायरेक्टर सोशल मीडिया के algorithmic और attention-collapsing नेचर को डाइल्यूट करते हैं, उसे कंसंट्रेट करते हैं, और उसमें से ख़ुशी निकाल कर उसे बार-बार तब तक रिपीट करते हैं, जब तक कि बोरियत एक memetic terror में न बदल जाए।

Final Verdict (अंतिम निष्कर्ष: 2040 का Tinder)

Ultimately, Vignesh Shivan की “LIK” बिलकुल एक candyfloss (बुढ़िया के बाल/कॉटन कैंडी) की तरह है। यह बहुत sweet है, airy (हवादार) है, और इससे पहले कि हम समझ पाएं कि इसकी swirling energy हमें कौन सा dopamine hit देने की कोशिश कर रही थी, यह ख़त्म भी हो जाती है।

फिल्म बेशक थिएटर्स को 2040s के “Tinder” वाले time-travel ट्रिप में बदल देती है, लेकिन 80s का Tinder भी शायद ऐसा ही फील होता। फिल्म में एक undeniable energy ज़रूर है, इसके frames intimate बने रहते हैं, और यह आपको एक aesthetic दुनिया में bonkers (पागल) होने की इज़ाज़त देती है।

कुछ लोग इसे cringe कहते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया की अजीबोगरीब दुनिया को फिल्म में उतारना हमेशा obsolete (पुराना) या बहुत ज़्यादा authentic होने का रिस्क लेकर आता है। लेकिन अगर आप लॉजिक को साइड में रखकर महज़ एक विजुअल ट्रिप और ‘reverse nostalgia’ के dopamine hit की तलाश में हैं, तो शायद यही वह टाइम-ट्रैवल है जिसकी आपको ज़रूरत है|

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